बाल संरक्षण आयोग
‘रेगुलेटरी अथॉरिटी’ बनाने की मांग
देहरादून। उत्तराखंड में कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे कोचिंग सेंटरों और उनके अनियमित संचालन को लेकर उत्तराखंड बाल संरक्षण आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। आयोग की अध्यक्ष गीता खन्ना ने कोचिंग संस्थानों और निजी कॉलेजों द्वारा किए जा रहे अभिभावकों के शोषण और छात्रों की सुविधाओं में अनदेखी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने सरकार से मांग की है कि इन संस्थानों पर लगाम कसने के लिए तत्काल एक ‘रेगुलेटरी अथॉरिटी’ का गठन किया जाए।
सिंडिकेट के जरिए हो रही वसूली
गीता खन्ना ने आरोप लगाया कि राजधानी देहरादून समेत पूरे प्रदेश में कोचिंग संस्थानों ने एक ‘सिंडिकेट’ बना रखा है।
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फीस का जाल: संस्थान अभिभावकों से साल भर की मोटी फीस वसूलने के लिए फाइनेंस एजेंसियों का सहारा ले रहे हैं।
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आर्थिक बोझ: फीस को फाइनेंस कराकर अभिभावकों को कर्ज के जाल में फंसाया जा रहा है, जो सीधे तौर पर ठगी है।
सुविधाओं के नाम पर छलावा
आयोग की अध्यक्ष ने केवल कोचिंग ही नहीं, बल्कि निजी कॉलेजों और हॉस्टलों की स्थिति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा:
“प्रदेश के कई कॉलेजों में हॉस्टल के नाम पर भारी भरकम रकम वसूली जा रही है, लेकिन बच्चों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल रही हैं। यह बच्चों के अधिकारों का हनन और अभिभावकों के साथ धोखाधड़ी है।”
जांच और नियमन की आवश्यकता
गीता खन्ना ने स्पष्ट किया कि अभिभावकों का शोषण और बच्चों का मानसिक उत्पीड़न अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने सरकार से निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
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रेगुलेटरी बॉडी का गठन: एक ऐसी अथॉरिटी बनाई जाए जो कोचिंग और हॉस्टलों के मानकों की जांच करे।
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विस्तृत जांच: संस्थानों के संचालन, फीस स्ट्रक्चर और दी जा रही सुविधाओं की पारदर्शिता की जांच हो।
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कठोर कार्रवाई: नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों और कॉलेजों के खिलाफ सख्त कानूनी कदम उठाए जाएं।
