मानसून
देहरादून|उत्तराखंड में जून के अंत तक मानसून की एंट्री होने वाली है, लेकिन इसके साथ ही आपदा का पुराना डर भी लौट आया है। राजधानी के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी में आयोजित ‘हिमालयन डिजास्टर’ कार्यशाला में विशेषज्ञों ने नदी किनारे हो रहे अवैध निर्माण और बसावट को लेकर बेहद डरावनी तस्वीर पेश की है।
दीवारों पर लिख दें- ‘यहाँ मौत फ्री मिलेगी’
NDMA (राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण) के सदस्य डॉ. दिनेश कुमार असवाल ने तीखा रुख अपनाते हुए कहा कि नदी के मुहाने पर बसना आत्मघाती है। उन्होंने कहा, “नदी किनारे बने घरों की दीवारों पर साफ लिख देना चाहिए कि यहाँ मौत मुफ्त में मिलने वाली है।” डॉ. असवाल ने जोर दिया कि बिना वैज्ञानिक प्लानिंग और HFL को चिन्हित किए बिना किया गया कोई भी निर्माण सीधे तौर पर जान से खिलवाड़ है।
गरीबी और मजबूरी का किनारा
वाडिया इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर डॉ. विनीत कुमार गहलोत ने एक अन्य पहलू पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लोग शौक से नहीं बल्कि मजबूरी और गरीबी के कारण जोखिम भरे क्षेत्रों में रहते हैं। देहरादून की रिस्पना और बिंदाल नदियों के किनारे बसी बस्तियाँ इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि जब तक सुरक्षित लैंड यूज प्लानिंग लागू नहीं होगी, तब तक हर मानसून जान-माल का नुकसान होता रहेगा।
सरकार के सामने चुनौती
शासन स्तर पर मानसून को लेकर तैयारियाँ अंतिम चरण में हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल उन हजारों परिवारों के पुनर्वास का है जो रेड जोन में रह रहे हैं। क्या मानसून की पहली बारिश से पहले सरकार कोई ठोस नीति बना पाएगी या एक बार फिर देवभूमि को केवल आपदा के भरोसे छोड़ दिया जाएगा?
