चैत्र नवरात्रि
राजस्थान से आई माँ राजराजेश्वरी की नई मूर्ति की हुई प्राण प्रतिष्ठा
चमोली : चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा और नव संवत्सर के पावन अवसर पर आज संपूर्ण देश के साथ-साथ सीमांत जनपद चमोली के पोखरी विकासखंड में भी भक्ति की बयार बह रही है। गढ़वाल के ऐतिहासिक 52 गढ़ों में शामिल ‘नागनाथ गढ़ी’ में आज से नौ दिवसीय विशेष पूजा अनुष्ठान का विधिवत शुभारंभ हो गया है। इस खास मौके पर स्थानीय ग्रामीणों और वन विभाग के सहयोग से राजस्थान से मँगाई गई माँ राजराजेश्वरी की भव्य संगमरमर की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई।
पुष्कर पर्वत पर विराजमान है शक्ति का केंद्र
समुद्र तल से 2,150 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पुष्कर पर्वत पर बसी नागनाथ गढ़ी अपनी नैसर्गिक सुंदरता और आध्यात्मिक शक्ति के लिए जानी जाती है। यहाँ माँ राजराजेश्वरी का प्राचीन मंदिर स्थित है, जो सदियों से आस्था का केंद्र रहा है। विभिन्न प्रजातियों के वृक्षों से आच्छादित यह क्षेत्र न केवल धार्मिक बल्कि अपनी भौगोलिक विशिष्टता के कारण भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
इतिहास के झरोखे से: राजा की तलवार और सती परिवार की परंपरा
इतिहासकारों के अनुसार, नागनाथ गढ़ी के राजा राजस्थान के राणा वंशीय राजाओं के वंशज थे। सीमित संसाधनों के कारण तत्कालीन टिहरी नरेश प्रताप शाह के आक्रमण में यहाँ का राजपाट समाप्त हो गया था, लेकिन देवी की एक चमत्कारिक तलवार आज भी यहाँ सुरक्षित है। मान्यता है कि राजा के कुल पुरोहित रहे नौठा के ‘सती परिवार’ द्वारा इस तलवार की पूजा की परंपरा आज भी जीवित है। सती परिवार के सदस्य हर साल शारदीय और बसंतीय नवरात्रि में यहाँ ‘हरियाली’ डालकर माँ की विशेष आराधना करते हैं।
जनसहयोग से सजा माँ का दरबार
यह क्षेत्र वन विभाग की नागनाथ रेंज के अंतर्गत आता है। मंदिर के प्रति अटूट श्रद्धा को देखते हुए रेंज के कर्मचारियों ने अपने निजी आर्थिक सहयोग से एक छोटा मंदिर निर्मित किया था। आज नवरात्रि के प्रथम दिवस पर विद्वान पंडितों के मंत्रोच्चारण के साथ नई मूर्ति स्थापित की गई, जिससे क्षेत्र का वातावरण पूरी तरह मंगलमय हो गया है। यहाँ आज भी छोटी और बड़ी गढ़ी के चौरासी खंडरों के अवशेष मौजूद हैं, जो इसके गौरवशाली इतिहास की गवाही देते हैं।
