मदरसा
देहरादून | उत्तराखंड में पिछले कुछ दिनों से मुस्लिम समुदाय से जुड़े एक संवेदनशील मामले ने शासन और प्रशासन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। बिहार से सैकड़ों बच्चों के अचानक देहरादून पहुंचने के बाद राज्य की जनसांख्यिकी में बदलाव की आशंका जताई जा रही है। इस मामले में उत्तराखंड वक्फ बोर्ड ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए इसे एक ‘बड़ी साजिश’ करार दिया है।
तालीम या चंदे का धंधा?
जांच में सामने आया है कि बिहार से लाए गए इन बच्चों को विभिन्न मदरसा संचालकों द्वारा देहरादून लाया गया था। पूछताछ में पता चला कि संचालक इन बच्चों को अपने मदरसों में तालीम दिलाने के नाम पर लाए हैं। हालांकि, वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने इसे चंदे के धंधे से जोड़कर देखा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कई मदरसा संचालक दूसरे राज्यों के यतीम बच्चों को तालीम के नाम पर ढाल बनाकर केवल ‘चंदे का कारोबार’ चला रहे हैं।
‘उत्तराखंड के मदरसों में सिर्फ उत्तराखंडी बच्चे’
वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि देवभूमि की डेमोग्राफी को बदलने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बोर्ड ने अब नई प्राथमिकताएं तय की हैं:
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स्थानीय प्राथमिकता: उत्तराखंड के मदरसों में अब केवल उत्तराखंड के बच्चों को ही दाखिला मिलेगा।
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तर्क: अन्य राज्यों में भी पर्याप्त मदरसे मौजूद हैं, अतः उन प्रदेशों के बच्चों को वहीं तालीम लेनी चाहिए।
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कड़ी कार्रवाई: जो मदरसा संचालक बाहरी राज्यों से बच्चों को लाकर नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, उनके विरुद्ध कठोर कानूनी प्रावधान किए जा रहे हैं।
समान शिक्षा लागू न करने वाले मदरसे होंगे बंद
सरकार ने इस दिशा में एक बड़ा फैसला लेते हुए पुराने बोर्ड को भंग करने का निर्णय लिया है। शादाब शम्स ने स्पष्ट किया कि:
“अब उत्तराखंड के रजिस्टर्ड मदरसों में दी जाने वाली शिक्षा ‘समान शिक्षा’ के अनुरूप होगी। जिन मदरसों में आधुनिक और समान शिक्षा मुहैया नहीं कराई जाएगी, उन्हें तुरंत बंद कर दिया जाएगा।”
बोर्ड के इस फैसले से साफ है कि अब मदरसों को केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित न रहकर मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़ना होगा, अन्यथा उनके लाइसेंस रद्द किए जा सकते हैं।
