देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में नर्सिंग बेरोजगारों का आंदोलन अब आत्मघाती मोड़ पर पहुंच गया है। पिछले 159 दिनों से शांतिपूर्ण धरना दे रहे युवाओं का सब्र उस वक्त टूट गया, जब पिछले 50 घंटों से सर्वे चौक स्थित पानी की टंकी पर चढ़े आंदोलनकारियों में से महिला कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ज्योति रौतेला ने पेट्रोल छिड़ककर आत्मदाह का प्रयास किया। गनीमत रही कि साथ मौजूद साथियों ने उन्हें समय रहते रोक लिया, वरना अंतर्राष्ट्रीय नर्सिंग दिवस पर एक बड़ा हादसा हो सकता था।
अस्पताल के बेड पर ‘भविष्य के रक्षक’
आंदोलन की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भूख-प्यास के कारण अब तक 12 प्रदर्शनकारियों की तबीयत बिगड़ चुकी है। इनमें से 4 नर्सिंग बेरोजगारों की स्थिति नाजुक होने के कारण उन्हें आईसीयू (ICU) में भर्ती कराया गया है। बावजूद इसके, टंकी पर मौजूद अन्य प्रदर्शनकारी नीचे उतरने को तैयार नहीं हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि जब तक ‘वर्षवार भर्ती’ की मांग पूरी नहीं होती, वे मौत को गले लगाने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
सवालों के घेरे में प्रशासन और शासन
इस घटनाक्रम ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
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आखिर प्रशासन इन युवाओं की जान जोखिम में पड़ने का इंतज़ार क्यों कर रहा था?
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150 दिनों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कोई ठोस समाधान क्यों नहीं निकला?
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क्या केवल ‘नई नियमावली’ का आश्वासन उन युवाओं के लिए काफी है जो सालों से नियुक्ति की राह देख रहे हैं?
डीजी हेल्थ से वार्ता विफल: आश्वासन पर भरोसा नहीं
मंगलवार को डीजी हेल्थ डॉ. सुनीता टम्टा और सीडीओ अभिनव शाह ने प्रदर्शनकारियों से फोन पर वार्ता की और आश्वासन दिया कि वर्षवार भर्ती का प्रस्ताव शासन को भेजा जाएगा। हालांकि, नर्सिंग एकता मंच के अध्यक्ष नवल पुंडीर ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। दूसरी ओर, स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने दून अस्पताल के कार्यक्रम में नई सेवा नियमावली और हॉस्टल सुविधा का वादा तो किया, लेकिन आंदोलनकारियों ने इसे केवल ‘भटकाने वाली रणनीति’ करार दिया है।
हताशा और उम्मीद के बीच का संघर्ष
फिलहाल मौके पर कई थानों की फोर्स तैनात है और पूरे सर्वे चौक इलाके में तनाव व्याप्त है। एक तरफ सरकार नर्सिंग को ‘पवित्र पेशा’ बताकर गुणगान कर रही है, वहीं दूसरी ओर योग्य उम्मीदवार नियुक्तियों के लिए अस्पतालों के आईसीयू में संघर्ष कर रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या सरकार इस गतिरोध को तोड़ने के लिए कोई ठोस निर्णय लेती है या युवाओं का यह आक्रोश किसी बड़ी अनहोनी को जन्म देगा।
