पत्रकार वार्ता
- एराड़ी गांव विवाद: दून हैचरीज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा 144 नाली कृषि भूमि खरीदकर छोटे-छोटे भूखंडों में बेचने के आरोपों की जांच की मांग।
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कंपनियों की आड़ में खेल: वर्ष 2003 से पहले की पुरानी कंपनियों के नाम पर भू-कानून के प्रावधानों को दरकिनार करने की आशंका।
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लैंसडौन और यमकेश्वर में जांच: रिसॉर्ट्स, आश्रमों, वेलनेस सेंटरों और पंचकर्म केंद्रों द्वारा कृषि भूमि के व्यावसायिक उपयोग तथा भूजल दोहन पर गंभीर सवाल।
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प्रमुख मांग: धारा 154 की समीक्षा और उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप सख्त भू-कानून लागू करने की हुंकार।
एराड़ी गांव में 144 नाली भूमि की खरीद पर उठे गंभीर सवाल
देहरादून: अधिवक्ता सेवा मंच एवं पहाड़ स्वाभिमान सेना उत्तराखंड ने एक संयुक्त पत्रकार वार्ता में उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि की खरीद-फरोख्त और भू-कानून के कथित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। वक्ताओं ने जनपद पौड़ी गढ़वाल के एराड़ी गांव में ‘दून हैचरीज प्राइवेट लिमिटेड’ द्वारा लगभग 144 नाली भूमि की खरीद को उच्चस्तरीय जांच का विषय बताया है।
आरोप है कि भूमि खरीदते समय दस्तावेजों में इसका प्रयोजन ‘कृषि कार्य’ दर्शाया गया, लेकिन रजिस्ट्री के तुरंत बाद इसे छोटे-छोटे भूखंडों (प्लॉटों) में विभाजित कर बाहरी व्यक्तियों को बेचा जा रहा है। मंच ने मांग की है कि इस पूरी प्रक्रिया के राजस्व अभिलेखों और रजिस्ट्री दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच हो।
पुरानी कंपनियों के जरिए भू-कानून को दरकिनार करने का आरोप
पत्रकार वार्ता में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि कुछ कंपनियां वर्ष 2003 से पूर्व की भूमि खरीद और पंजीकरण का हवाला देकर वर्तमान नियमों को छका रही हैं। ‘दून हैचरीज’ के संबंध में कहा गया कि कंपनी वर्ष 1995 के गठन का दावा करती है, जबकि इसके वर्तमान निदेशक वर्ष 2016 के बाद के बताए जा रहे हैं।
अधिवक्ता सेवा मंच के अध्यक्ष एडवोकेट संदीप चमोली और पहाड़ स्वाभिमान सेना के अध्यक्ष पंकज उनियाल ने मांग की कि वर्ष 2003 से पूर्व अस्तित्व में आई ऐसी सभी कंपनियों का जनपदवार विशेष ऑडिट कराया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वे किस वास्तविक उद्देश्य से काम कर रही हैं।
लैंसडौन, यमकेश्वर और कैटल गांव में पर्यावरण व जल स्रोतों पर खतरा
वक्ताओं ने लैंसडौन और यमकेश्वर क्षेत्रों में भूमि उपयोग परिवर्तन के मामलों की संयुक्त टीम (राजस्व, वन और विकास प्राधिकरण) से जांच कराने की मांग की।
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कैटल गांव का मामला: यहां बड़े पैमाने पर पेड़ों के कटान के बाद आश्रम निर्माण और आरक्षित वन क्षेत्र से रास्ता बनाए जाने के आरोपों की जांच की मांग उठी।
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जल संकट: पर्वतीय क्षेत्रों में आश्रमों, होटलों और वेलनेस सेंटरों द्वारा बड़े पैमाने पर की जा रही बोरिंग और भूजल दोहन पर रोक लगाने की मांग की गई, जिससे स्थानीय प्राकृतिक जलस्रोतों को बचाया जा सके।
सरकार के सामने रखी गई प्रमुख मांगें
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एराड़ी गांव की 144 नाली भूमि की खरीद और प्लॉटिंग की उच्चस्तरीय जांच हो।
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कृषि भूमि पर बिना अनुमति संचालित हो रही व्यावसायिक गतिविधियों की वैधानिकता जांची जाए।
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भू-कानून की धारा 154 के प्रावधानों की पुनर्समीक्षा कर कठोर प्रतिबंधात्मक व्यवस्था बनाई जाए।
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आरक्षित वन क्षेत्रों में बने अवैध मार्गों और निर्माण कार्यों की वन विभाग द्वारा जांच हो।
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नियमों का उल्लंघन करने वाले दोषियों और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
इस दौरान पत्रकार वार्ता में एडवोकेट नवनीत कुकरेती, एडवोकेट हरेंद्र बेदी, अनिल डोभाल, एडवोकेट विनीत मिश्रा, एडवोकेट कीर्ति वर्धन बिष्ट और एडवोकेट प्रदीप पासवान सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
