हरीश रावत
उत्तराखंड की राजनीति के धुरंधर और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का 15 दिनों का ‘राजनीतिक अवकाश’ आज शुक्रवार, 10 अप्रैल को समाप्त हो गया है। 28 मार्च को शुरू हुआ यह अवकाश महज एक विश्राम नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति में एक बड़ा संदेश देने की सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है।
रामनगर विवाद और नाराजगी की पृष्ठभूमि
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 28 मार्च को हुई, जब उत्तराखंड कांग्रेस में 6 नए नेताओं की ज्वाइनिंग हुई। चर्चा थी कि हरीश रावत अपने करीबी नेता संजय नेगी को भी पार्टी में शामिल कराना चाहते थे, लेकिन हाईकमान या गुटीय राजनीति के चलते ऐसा नहीं हो सका। इसी नाराजगी को ढाल बनाकर रावत ने 15 दिनों के राजनीतिक अवकाश की घोषणा कर दी, जिससे पूरी कांग्रेस में हलचल मच गई।
अवकाश में भी रहे चर्चा का केंद्र
हरीश रावत ने इस 15 दिनों के दौरान यह साबित कर दिया कि वह ‘नेपथ्य’ में रहकर भी ‘मुख्य मंच’ पर बने रहना जानते हैं।
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सोशल मीडिया सक्रियता: 77 साल की उम्र में भी उन्होंने प्रतिदिन 8 से 10 जनसंपर्क कार्यक्रमों में हिस्सा लिया।
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फोकस शिफ्ट: उनके इस कदम से कांग्रेस ज्वाइन करने वाले 6 नए नेताओं की चर्चा गौण हो गई और पूरा प्रदेश सिर्फ रावत की अगली चाल पर बात करने लगा।
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नेताओं का जमावड़ा: इस दौरान न केवल कांग्रेसी बल्कि कैबिनेट मंत्री तक उनसे मिलने पहुंचे, जिससे उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता और बढ़ गई।
कांग्रेस के भीतर आया ‘सियासी भूचाल’
रावत के इस मौन विरोध ने पार्टी के भीतर ध्रुवीकरण को स्पष्ट कर दिया।
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समर्थकों का रुख: गोविंद सिंह कुंजवाल और प्रदीप टम्टा जैसे दिग्गजों ने खुलकर रावत का साथ दिया।
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तीखी बयानबाजी: हरक सिंह रावत के तंज पर धारचूला विधायक हरीश धामी ने यहाँ तक कह दिया कि रावत समर्थकों को सामूहिक इस्तीफा दे देना चाहिए।
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हाईकमान को संदेश: दिल्ली से लेकर देहरादून तक यह संदेश साफ चला गया कि 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए हरीश रावत को किनारे करना पार्टी के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
‘कंडाली’ और ‘विपरीत ध्रुव’: विरोधियों को कड़ा जवाब
अपने अवकाश के अंतिम दिन रावत ने सोशल मीडिया पर उन लोगों को आड़े हाथों लिया जो उनके भाजपा में जाने की अटकलें लगा रहे थे या उन पर निशाना साध रहे थे। उन्होंने लिखा:
“बड़ा अजीब नजारा है, राजनीति के विपरीत ध्रुवों के लोग भी मेरे खिलाफ एक जैसी भाषा बोल रहे हैं। कुछ लोग तो मुझे भाजपा में शामिल करने की खबरें तक परोस रहे हैं।”
उन्होंने चुटकी लेते हुए उन दोस्तों का भी जिक्र किया जिन्होंने उन्हें ‘कंडाली’ (बिच्छू घास) लगाने का सुझाव दिया था।
