कविता
नैनीताल: “मेरे सपनों की उड़ान आसमान तक है, मुझे बनानी अपनी पहचान आसमान तक है।” ये पंक्तियां उत्तराखंड की साहसी बेटी कविता बिष्ट के जीवन पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। साल 2008 में एक दर्दनाक एसिड अटैक ने भले ही कविता से उनका चेहरा और आंखों की रोशनी छीन ली हो, लेकिन उनके फौलादी इरादों को वह कम नहीं कर सका। आज कविता न सिर्फ खुद आत्मनिर्भर हैं, बल्कि 200 से अधिक महिलाओं के जीवन में स्वावलंबन का उजाला भर रही हैं।
हादसे को दी मात, हुनर से गढ़ी नई राह
दिल्ली में काम के दौरान हुए हमले के बाद कविता के सामने अंधेरा था, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय कढ़ाई, बुनाई, डिजाइनिंग और मोमबत्ती बनाने का प्रशिक्षण लिया। आज रामनगर के जस्सागांजा क्षेत्र में उनकी कार्यशाला महिला सशक्तिकरण का केंद्र बन चुकी है। यहाँ महिलाएं गोबर के इको-फ्रेंडली दीये, ऐपण कला से सजे उत्पाद, जूट बैग और हस्तशिल्प का निर्माण कर आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं।
सिर्फ काम नहीं, ममता की भी मिसाल
कविता का सेवा भाव सिर्फ स्वरोजगार तक सीमित नहीं है। उन्होंने करीब आठ महीने पहले एक दिव्यांग बच्ची को गोद लिया, जिसकी देखभाल वह अपने परिवार की तरह कर रही हैं। कविता का कहना है कि उनकी आंखों की रोशनी भले चली गई, लेकिन उनके सपनों की चमक आज भी बरकरार है।
सरकारी उपेक्षा के बावजूद जारी है संघर्ष
गौरलतब है कि साल 2013 में उत्तराखंड सरकार ने कविता को महिला सशक्तिकरण का ब्रांड एंबेसडर बनाया था, लेकिन यह साथ लंबा नहीं चला। कविता बताती हैं कि स्थायी सहयोग न मिलने के बावजूद उन्होंने अपना काम रुकने नहीं दिया। आज उनकी बनाई सजावटी मालाएं और जूट बैग स्थानीय बाजारों की पसंद बने हुए हैं।
“मेरी आंखों से दुनिया दिखना बंद हो गई, लेकिन मैंने सपनों को मरने नहीं दिया। अब मेरा लक्ष्य उन महिलाओं को पैरों पर खड़ा करना है जिनके पास अवसर नहीं हैं।”
