सफेद चादर की जगह पहाड़ियों पर जमी धूल; हर्षिल में नए साल पर बर्फबारी की उम्मीद लगाए बैठे पर्यटक
उत्तरकाशी। देवभूमि उत्तराखंड के सीमांत जनपद उत्तरकाशी में मौसम का मिजाज इस साल डराने वाला है। दिसंबर का महीना बीतने को है, लेकिन उच्च हिमालयी क्षेत्र जो इस समय तक चांदी जैसी बर्फ से लकदक रहते थे, वे अब बर्फ विहीन और वीरान नजर आ रहे हैं। पहाड़ों का यह बदला हुआ रूप न केवल डरावना है, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन की ओर भी इशारा कर रहा है।
धुंध और ‘कोरी ठंड’ का कहर
जनपद में आसमान साफ होने के बावजूद हवा में भारी धुंध छाई हुई है। बर्फबारी न होने के कारण ‘कोरी ठंड’ पड़ रही है, जिससे पानी के स्रोत जमने लगे हैं और आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। स्थानीय लोग बताते हैं कि पहाड़ियों का रंग जो सफेद होना चाहिए था, वह अब धूल भरा और भूरा नजर आ रहा है। मौसम का यह मिजाज रोमांचक होने के बजाय भयावह होता जा रहा है।
नदियों के जलस्तर पर संकट
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में गंगा और यमुना जैसी बारहमासी नदियों के जलस्तर में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है। बर्फबारी ही इन नदियों के ग्लेशियरों को पुनर्जीवित करती है, और इसके अभाव में भविष्य में जल संकट गहरा सकता है।
पर्यटन पर मिला-जुला असर
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शीतकालीन प्रवास: मां गंगा (मुखबा) और यमुना (खरसाली) के शीतकालीन पड़ावों पर देश-विदेश से पर्यटक तो पहुंच रहे हैं, लेकिन कड़ाके की सूखी ठंड के कारण वे इन स्थानों पर अधिक समय तक नहीं ठहर रहे हैं।
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हर्षिल की उम्मीद: नए साल का जश्न मनाने के लिए पर्यटकों ने हर्षिल घाटी की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। पर्यटकों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन हर किसी की आंखें आसमान की ओर हैं। पर्यटन व्यवसायी और सैलानी दोनों ही उम्मीद लगाए बैठे हैं कि नया साल हर्षिल में बर्फबारी की सौगात लेकर आएगा।
स्थानीय प्रशासन और पर्यावरण प्रेमी इस अप्रत्याशित मौसमी बदलाव को जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का गंभीर संकेत मान रहे हैं।
